Tuesday, October 10, 2017

आखिर यह भी तो नही रहेगा

*""*

*🔵 एक फकीर अरब मे हज के लिए पैदल निकला। रात हो जाने पर एक गांव मे जाफ़र नामक व्यक्ति के दरवाजे पर रूका। जाफ़र ने फकीर की खूब सेवा किया। दूसरे दिन जाफ़र ने बहुत सारे उपहार दे कर बिदा किया। फकीर ने दुआ किया -"खुदा करे तू दिनों दिन बढता ही रहे।"*

*🔴 सुन कर जाफ़र हंस पड़ा और कहा -"अरे फकीर! जो है यह भी नहीं रहने वाला है"। यह सुनकर फकीर चला गया ।*

*🔵 दो वर्ष बाद फकीर फिर जाफ़र के घर गया और देखा कि जाफ़र का सारा वैभव समाप्त हो गया है। पता चला कि जाफ़र अब बगल के गांव में एक जमींदार के वहां नौकरी करता है। फकीर जाफ़र से मिलने गया। जाफ़र ने अभाव में भी फकीर का स्वागत किया। झोपड़ी मे फटी चटाई पर बिठाया ।खाने के लिए सूखी रोटी दिया।*

*🔴 दूसरे दिन जाते समय फकीर की आखों मे आंसू थे। फकीर कहने लगा अल्लाह ये तूने क्या किया?*

*🔵 जाफ़र पुनः हंस पड़ा  और बोला -"फकीर तू क्यों दुखी हो रहा है? महापुरुषों ने कहा है -"खुदा  इन्सान को जिस हाल मे रखे  खुदा को धन्यवाद दे कर खुश रहना चाहिए।समय सदा बदलता रहता है और सुनो यह भी नहीं रहने वाला है"।*

*🔴 फकीर सोचने लगा -"मैं तो केवल भेस से फकीर हूं सच्चा फकीर तो जाफ़र तू ही है।"*

*🔵 दो वर्ष बाद फकीर फिर यात्रा पर निकला और जाफ़र से मिला तो देख कर हैरान रह गया कि जाफ़र तो अब जमींदारो का जमींदार बन गया है। मालूम हुआ कि हमदाद जिसके वहां जाफ़र नौकरी करता था वह संतान विहीन था मरते समय अपनी सारी जायदाद जाफ़र को दे गया।*

*🔴 फकीर ने जाफ़र से कहा - "अच्छा हुआ वो जमाना गुजर गया। अल्लाह करे अब तू ऐसा ही बना रहे।"*

*🔵 यह सुनकर जाफ़र फिर हंस पड़ा  और कहने लगा - "फकीर!  अभी भी तेरी नादानी बनी हुई है"।*

*🔴 फकीर ने पूछा क्या यह भी नही रहने वाला है? जाफ़र ने उत्तर दिया -"या तो यह चला जाएगा या फिर इसको अपना मानने वाला ही चला जाएगा। कुछ भी रहने वाला नहीं है। और अगर शाश्वत कुछ है तो वह है परमात्मा और इसका अंश आत्मा। "फकीर चला गया ।*

*🔵 डेढ साल बाद लौटता है तो देखता है कि जाफ़र का महल तो है किन्तु कबूतर उसमे गुटरगू कर रहे हैं। जाफ़र कब्रिस्तान में सो रहा है। बेटियां अपने-अपने घर चली गई है।बूढी पत्नी कोने मे पड़ी है ।*

*"कह रहा है आसमां यह समां कुछ भी नहीं।*
*रो रही है शबनमे नौरंगे जहाँ कुछ भी नहीं।*
*जिनके महलों मे हजारो रंग के जलते थे फानूस।*
*झाड़ उनके कब्र पर बाकी निशां कुछ भी नहीं।"*

*🔵 फकीर सोचता है -" अरे इन्सान ! तू किस बात का  अभिमान करता है? क्यों इतराता है? यहां कुछ भी टिकने वाला नहीं है दुख या सुख कुछ भी सदा नहीं रहता।*

*🔴 तू सोचता है - "पड़ोसी मुसीबत मे है और मैं मौज में हूं। लेकिन सुन न मौज रहेगी और न ही मुसीबत। सदा तो उसको जानने वाला ही रहेगा।*

*"सच्चे इन्सान हैं वे जो हर हाल मे खुश रहते हैं।*
*मिल गया माल तो उस माल मे खुश रहते हैं।*
*हो गये बेहाल तो उस हाल मे खुश रहते हैं।"*

*🔵 धन्य है जाफ़र तेरा सत्संग  और धन्य हैं तुम्हारे सद्गुरु। मैं तो झूठा फकीर हूं। असली फकीर तो तेरी जिन्दगी है।*

*🔴 अब मैं तेरी कब्र देखना चाहता हूं। कुछ फूल चढा कर दुआ तो मांग लूं।*

*🔵 फकीर कब्र पर जाता है तो देखता है कि जाफ़र ने अपनी कब्र पर लिखवा रखा है-*

*🌹 "आखिर यह भी तो नहीं रहेगा"*

*JAHID*

Wednesday, October 4, 2017

कितना प्यारा SMS है सबको शेयर करें*

*कितना प्यारा SMS है सबको शेयर करें*

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*अल्लाह का वादा है 'जो तेरे* *नसीब में है वो तुझे ज़रूर मिलेगा,* *चाहे वो दो पहाड़ो के बीच क्यों न हो...* *और जो तेरे नसीब में नहीं वो* *हरगिज़ नहीं मिलेगा, चाहे वो तेरे दोनों होठों के दरमियान क्यों ना हो* *बेशक अल्लाह बेनियाज़ और बड़ी रहमत वाला है*
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*हज़रत अबू बकर सिद्दीक़ رضي الله عنه. फरमाते है - किसी को दुःख देने वाला कभी खुश नहीं रहे सकता*
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*हज़रत उमर फारूक رضي الله عنه फरमाते है* *किसी की बे -बसी पे मत हँसो कल ये वक़्त तुम पर भी आसकता है।*
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*हज़रत उस्मान गनी رضي الله عنه. फरमाते है*
*किसी की आँख तुम्हारी वजह से नम न हो*
*क्योंकी तुम्हे उस के हर आंसू का क़र्ज़ चुकाना होगा*
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*हज़रत अली رضي الله عنه. फरमाते है -* *मज़लूम और नमाज़ी की आह से डरो,* *क्योंकि आह किसी की भी हो* *अर्श को चीर कर اللّه के पास जाती है*
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*हज़रत अबू बकर सिद्दीक़ رضي الله عنه. फरमाते है*
*उस दिन पे आंसू बहाओ जो तुम ने नेकी के बिना गुज़ारा हो*
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*हज़रत उमर फारूक رضي الله عنه.* *फरमाते है - ज़ालिमों को माफ़ करना मज़लूमों पे ज़ुल्म है*
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*हज़रत उस्मान गनी رضي الله عنه. फरमाते है- जुबां दरुस्त हो जाये तो*
*दिल भी दरुस्त हो जाता है*
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*हज़रत अली رضي الله عنه. फरमाते है-* *जहा तक हो सके लालच से* *बचो,लालच में ज़िल्लत ही ज़िल्लत है*
*दुसरो को इस तरह माफ़ करो जिस तरह الله तुम्हे माफ़ करता है*
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Sunday, October 1, 2017

कर्बला

जब इमाम हुसैन हज करने के लिए मदीना से मक्का आए तो उन्हें मालूम हुआ कि यहां यज़ीद के लोग उनका कत्ल कर सकते हैं तो वो मक्का से बिना हज किए ही चले गए। क्योंकि वो अल्लाह के पाक घर में खून-खराबा नहीं चाहते थे।  वो मक्का से इराक के शहर कूफा पहुंचे।  उन्होंने कूफे के लोगों से मदद मांगी।  यज़ीद के सैनिक इमाम हुसैन की तलाश में कूफा भी पहुंच गए।  इमाम हुसैन ने अपने पैसों से कर्बला में कुछ जमीन खरीदी और वहां अपने तंबू गाड़ दिए और अपने परिवार के 72 सदस्यों के साथ इन तंबुओं में ठहर गए।  यज़ीद का हजारों का लश्कर भी कर्बला के मैदान में पहुंच गया। प्राचीन परंपराओं के अनुसार कर्बला का अर्थ है ईश्वर की पवित्र भूमि। कहते हैं ये बस्ती कई बार उजड़ी और कई बार आबाद हुई।  जब यज़ीद की सेना कर्बला पहुंची तो इमाम हुसैन को मालूम हुआ कि फौजी प्यासे हैं तो उन्होंने फौज को पानी पिलवाया।  इमाम हुसैन का कहना था कि हमारी लड़ाई खिलाफत के पद की नही बल्कि नाना (हज़रत मुहम्मद) के दीन को बचाने की है. कुछ इतिहासकारों का मत है यज़ीद ने अपने कमांडर उमरे साद को आदेश दिया था कि वो इमाम हुसैन और उनके परिवार को शाम (सीरिया) ले कर आए और वो यहां उनसे बैत करने को कहेगा।  लेकिन इसी दौरान शिम्र, इब्ने जियाद का खत लेकर पहुंचता है जिसमे लिखा था कि तुम इमाम हुसैन को कत्ल कर दो नहीं तो शिम्र को सेनापति बना दो। बहरहाल हुकूमत हो या खिलाफत हमेशा षडयंत्र करने वाले सक्रिय रहते हैं। इसी कर्बला के मैदान में जहां इमाम हुसैन ने अपने विरोधी की सेना को पानी पिलवाया।  वहीं उनके विरोधियों ने फुरात नदी से निकली नहर पर कब्जा कर लिया और इमाम हुसैन के परिवार का पानी बंद कर दिया।  इमाम हुसैन जानते थे कि हजारों फौजियों के मुकाबले में उनके 72 साथी शहीद हो जाएंगे।  वो चाहते तो खुद समेत सबको बचा सकते थे लेकिन उनकी नजर में दीनी उसूल ज्यादा अहम थे।इमाम हुसैन तीन दिन तक भूखे-प्यासे औरतों और बच्चों से सब्र करने को कहते रहे।  वो अपने छह महीने के बेटे को पानी पिलाने नहर पर ले गए।  उनको उम्मीद थी कि इस बच्चे को तो पानी मिल ही जाएगा। लेकिन जालिम फौजियों ने उस बच्चे को भी नही बख्शा और एक तीन कीलों वाला तीर उसके गले मे दे मारा जो आर-पार होकर इमाम हुसैन के बाजू में जा धंसा।  इमाम हुसैन के सामने उनके छह महीने के बेटे को कत्ल कर दिया गया लेकिन उन्होंने अपना इरादा न बदला। नौ मोहर्रम की रात को इमाम हुसैन अपने परिवार के लोगों के साथ रात भर दुआ करते रहे। वो अल्लाह से दुआ करते रहे कि अल्लाह उनकी कुर्बानी को कबूल कर ले और दीन व शरीयत को बचा ले। अगले दिन 10 मोहर्रम 61 हिजरी यानी 10 अक्टूबर, 680 ई. को कर्बला के मैदान में एक अजीब जंग हुई जिसमें हजारों प्रशिक्षित सैनिकों का मुकाबला छोटे-छोटे बच्चों और और औरतों समेत 72 भूखे-प्यासे लोगों से था।  नतीजा सबको मालूम था।  फिर भी लड़ना था। इंसानियत के लिए, सच्चाई के लिए, ईमान के लिए और शहादत के लिए। सभी मर्दों को कत्ल कर दिया गया।  बच्चों को मौत के घाट उतार दिया गया। औरतों को कैदी बना लिया गया।  इमाम हुसैन का कटा सिर नेजे (भाले) पर शहर की गलियों में घुमाया गया।  जालिमों ने अपने जुल्म की हर इंतेहा का प्रदर्शन किया लेकिन इमाम हुसैन से बैत न करा सके। इस तरह पैगंबर हज़रत मुहम्मद के नवासे और हज़रत अली के बेटे हज़रत इमाम हुसैन ने शहादत देकर अधर्मी और अत्याचारी के खिलाफ न सिर्फ अपनी बहादुरी का परिचय दिया बल्कि अपनी धर्मपरायणता का भी उदाहरण दिया।

(फर्स्टपोस्ट के लेख का महत्वपूर्ण अंश )

Friday, July 21, 2017

देश की स्वतंत्रता के लिए मुसलमानों ने क्या किया, इस बारे में ट्रिविय

इस देश की स्वतंत्रता के लिए मुसलमानों ने क्या किया, इस बारे में ट्रिविया:

यह सम्राट औरंगजेब था जिन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी से सूरत में 1686 में भारत छोड़ने को कहा था!

अंग्रेजों के खिलाफ पहला युद्ध आजादी से लगभग 200 साल पहले पलासी की लड़ाई में लड़ा गया था, जिसमें बंगाल के नवाब सिराजुद्वाला ने 1757 में ब्रिटिश द्वारा धोखा दिया था!

अंग्रेजों के खिलाफ विजय के प्रथम लक्षण मैसूर में देखे गए थे जहां नवाब हैदर अली ने 1782 में अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया था। उनके बेटे टिपू सुल्तान ने उनकी सफलता हासिल की थी, जिन्होंने 17 9 1 में उन्हें फिर से लड़ा था और अंततः 1799 में उन्हें धोखा देकर मार दिया गया था। टीपू सुल्तान युद्ध में मिसाइलों का इस्तेमाल करने वाला पहला जनरल था!

मुजाहिद आंदोलन सईद अहमद शहीद और उनके दो शिष्यों के नेतृत्व में 1824 और 1831 के दौरान सक्रिय थे और वे ब्रिटिश अधिकारियों से उत्तर-पश्चिमी प्रांत को मुक्ति में सफल रहे। सय्यद अहमद शहीद को खलीफा नामित किया गया था, लेकिन स्वतंत्रता कम ही थी और 1831 में उन्हें मार दिया गया था!

पिछले मुगल सम्राट, बहादुर शाह जफर 1857 में स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व करना था। एक देशव्यापी युद्ध 31 मई 1857 को एक साथ शुरू करना था, लेकिन ब्रिटिश सेना के बीच भारतीयों ने 10 मई 1857 को पहले विद्रोह किया !

1857 की घटनाओं के बाद एक चौंकाने वाली 5,00,000 मुस्लिम मारे गए, जिनमें से 5000 उलेमा (धार्मिक विद्वान) थे। ऐसा कहा जाता है कि दिल्ली से कलकत्ता तक ग्रांड ट्रंक रोड पर एक भी पेड़ नहीं था, जिस पर एलिम के शरीर को लटका नहीं पाया गया था!

भारतीय उलेमा ने अंग्रेजों के खिलाफ जिहाद के लिए बुलाया और भारत को दारुल हारब (शत्रु नियंत्रण के तहत क्षेत्र) के रूप में घोषित किया। यह कॉल पूरे देश में मुस्लिमों के साथ ब्रिटिशों के खिलाफ बढ़ रहा है।

औपनिवेशिक साम्राज्य के सांस्कृतिक और शैक्षिक बंधनों से देशवासियों को मुक्त करने के लिए, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की तरह सीखने के ऊपरी केंद्रों की स्थापना 1 9वीं सदी के अंत में हुई थी, जिसे अभी भी भारत की प्रमुख विश्वविद्यालयों में गिना जाता है।

1 9 05 में शखुल इस्लाम मौलाना महमूद हसन और मौलाना उबैदुल्ला सिंधी ने रश्मी रूमाल तहरीक को ब्रिटिश सरकार के खिलाफ सभी भारतीय राज्यों को एकजुट करने के लिए शुरू किया था। मौलाना महमूद को माल्टा और कालापनी में उसी समय के लिए कैद किया गया जहां उन्होंने अपना अंतिम सांस ली।

इंडियन नेशनल कांग्रेस, अपनी स्थापना के समय से स्वतंत्रता के लिए 9 मुस्लिम राष्ट्रपति थे!

बैरिस्टर एम.के. गांधी ने एक मुसलमान के स्वामित्व वाले दक्षिण अफ्रीका में एक कानूनी फर्म में सेवा की, जिन्होंने 1 9 16 में अपने स्वयं के खर्चों को गांधीजी को भारत भेज दिया। यहां उन्होंने अली बिर्रद्रन (अली ब्रदर्स) के तहत अपना आंदोलन शुरू किया!

मोप्पला आंदोलन ने एक ही युद्घ में 3000 मुसलमानों को मार डाला!

असहयोग आंदोलन और स्वदेशी आंदोलन ने भारी मुस्लिम भागीदारी को देखा। जनाब सबसिद्दीक जो उस समय के चीनी-राजा थे, ने बहिष्कार के रूप में अपना व्यवसाय छोड़ दिया। खोजा और मेमन समुदायों ने उस समय के सबसे बड़े व्यापारिक स्वामित्वों का स्वामित्व किया और वे बहिष्कार का समर्थन करने के लिए अपने क़ीमती उद्योगों से अलग हो गए!

1 9 42 के भारत छोड़ो आंदोलन वास्तव में मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने कल्पना की थी। 8 अगस्त को उन्हें कैद और अहमदनगर को भेजा गया था, जिसके कारण गांधीजी को 9 अगस्त को आंदोलन का नेतृत्व करना पड़ा!

ज्योतिबा फुले को उनके पड़ोसी, उस्मान बागबान ने अपनी शैक्षिक गतिविधियों में प्रायोजित किया था, इतना कि वह स्कूल जिसे उन्होंने पढ़ाया था, श्री उस्मान ने किया था। उनकी बेटी, फातिमा वहां पहली लड़की थी और उसके बाद एक शिक्षक के रूप में शामिल हो गए थे!

मुस्लिम नेताओं ने हमेशा दलितों का समर्थन किया। लंदन में आयोजित गोलमेज सम्मेलन में, मौलाना मोहम्मद अली जौहर को मुसलमानों की अन्य सभी मांगों को स्वीकार करने के बदले दलित कारणों को त्यागने में प्रलोभन हुआ था। लेकिन मौलाना जोहर ने दलितों को त्याग दिया!

जब डॉ। बी.आर. अम्बेडकर 1 9 46 के केंद्रीय चुनाव नहीं जीत सके, बंगाल मुस्लिम लीग ने अपनी अपनी एक सीट रिक्त कर दी और डॉ अंबेडकर को इसे प्रदान किया, जो उपचुनाव में इसे जीता। मुस्लिम लीग ने यह इशारा संविधान सभा में प्रवेश करने और बाकी के रूप में बताते हुए, इतिहास है!

मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानियों पत्रकारिता के क्षेत्र में भी सक्रिय थे। मौलाना आज़ाद ने औपनिवेशिक शक्तियों द्वारा कई बार रोका जाने के बावजूद अंग्रेजों के खिलाफ अपनी कलम का इस्तेमाल किया। वास्तव में, भारत के स्वतंत्रता संग्राम के कारण हत्या करने वाले पहले पत्रकार भी मुस्लिम थे - मौलाना बाकर अली

Wednesday, May 24, 2017

माँ बाप की इज्ज़त करने के 35 तरीके

अपने माँ बाप की इज्ज़त करने के 35 तरीके


1. उनकी मोजूदगी में अपने फोन को दूर रखें!
2. वो क्या कह रहे हैं इस पर ध्यान दें!
3. उनकी राय को माने!
4. उनकी बातचीत में शामिल हों!
5. उन्हें मोहब्बत के साथ देखें!
6. हमेशां उनकी तारीफ करें!
7. उनको अच्छी खबर जरूर बताएँ!
8. उन्हे  बुरी खबर बताने से बचें!
9. उनके दोस्तों और रिशतेदारों  से अच्छी तरह से बोलें!
10. आपके लिये किये गए उनके काम हमेशां याद रखें!
11. अगर वोह एक ही कहानी दोहरायें तो भी ऐसे सुनें जैसे पहली बार सुन रहे हो!
12. पुरानी दर्दनाक यादों को न दोहरायें!
13. उनकी मोजूदगी  में कानाफ़ूसी हार्गिज न करें!
14. उनके साथ तमीज़ से बैठें!
15. उनके खायालात को न तो घटिया बताये न ही उनकी मजम्मत (आलोचना)  करें!
16. उनकी बात काटने से बचें!
17. उनकी उम्र की इज्ज़त करें!
18. उनके आसपास उनके पोते/पोतियों को डांटने से बचें!
19. उनकी सलाह और हुकमों को मानें!
20. उनके फेसलों को मानें!
21. उनके साथ ऊँची आवाज़ में बात न करें!
22. रास्ते में उनके आगे या सामने से न चलें!
23. उनसे पहले खाने से बचें!
24. उन्हें घूरें नहीं!
25. उन्हें तब भी फ़कर  मेहसूस करायें जब कि वे अपने को इसके लायक न समझें!
26. उनके सामने अपने पैर करके या उनकी ओर अपनी पीठ कर के बैठने से बचें!
27. न तो उनकी बुराई करें और न ही किसी दूसरे की उनंके  लिये की गई उनकी बुराई का ज़िकर करें!
28. उन्हें अपनी दुआओं में शामिल करें, बल्की पहला हक उन ही का है!
29. उनकी मोजूदगी  में ऊब या अपनी थकान ज़ाहिर न करें!
30. उनकी गलतियों और उन्हें नई technology का इलम (ज्ञान) ना होने पर उन पर हँसने से बचें!
31. कहने से पहले उनके काम करें!
32. रोजाना उनके पास बैठें!
33. उनके साथ बात में अपने अल्फाज (शब्दों) को एहतियात से चुनें!
34. उन्हें उसी नाम से पुकारें करें जो वे पसन्द करते हैं.
35. अपने किसी भी काम  पर  उन्हें तरजीह (प्राथमिकता)  दें...!!!

Saturday, April 15, 2017

औरत खुदा का दिया हुआ एक नायाब तोहफा है !!

📶औरत खुदा का दिया हुआ एक नायाब तोहफा है !!
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प्रेगनेन्ट औरत की 2 रकात नमाज आम औरत की 70 रकात नमाज से बढ़कर हे !!
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शौहर परेशान घर आए ओर बीवी उसे तसल्ली दे तो उसे जिहाद का सवाब मिलता है!।
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जो औरत अपने बच्चे के रोने की वजह से सो ना सकी उसे 70 गुलाम आजाद करने का सवाब मिलता हे !।
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शौहर और बीवी एक दूसरे को मोहब्बत की नजर से देखेँ तो अल्लाह उन्हे मोहब्बत की नजर से देखता है।।
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जो औरत अपने शौहर को अल्लाह के रास्ते मेँ भेजे वो जन्नत मेँ अपने शौहर से 500 साल पहले जाएगी ।।
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जो औरत आटा गुंदते वक़्त बिस्मिल्लाह पढ़े तो उसके रिज्क मेँ बरकत डाल दी जाती हे !!
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जो औरत गैर मर्द को देखती है  अल्लाह उसपर लानत भेजता हे !!
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जब औरत अपने शौहर के बिना कहे उनके पेर दबाती हे तो उसे 70 तोला सोना सदका करने का सवाब मिलता हे !!
☝जो पाक दामन औरत नमाज रोजे की पाबंदी करे और जो शौहर की खिदमत करे उसके लिए जन्नत के 8 दरवाजे खोल दिए जाते है।
☝औरत के एक बच्चे के पैदा करने पर  75 साल की नमाज का सवाब और हर एक दर्द पर 1 हज का सवाब हे ।
☝बारीक लिबास पहनने वाली और गैर मर्द से मिलने वाली औरत कभी जन्नत मेँ दाखिल नहीँ होगी ।
👉 👉जल्दी करो 
(1) मेहमान को खाना खिलाने में
(2) मैय्यत को दफनाने मे
(3) बालिग लड़कियो का निकाह कराने म
(4) कर्ज अदा करने में
(5) गुनाह से तौबा करने में !
"अस्ताग-फिरुल्लाहा रब्बी मिन-कुल्ली ज़न्बिउन वातुबू इलैही"
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आज आप यह मेसेज अगर किसी 1 को भी शेयर करदें तो आप सोच भी नही सकते कितने लोग "अल्लाह" से तौबा कर लेंगे इंशा अल्लाह
शेयर करना न भूलें.....

Monday, April 10, 2017

गुफ्तगू के उसुल व आदाब और अहकाम

गुफ्तगू के उसुल व आदाब और अहकाम


फुजुल_बात_चीत_की_मुमानियत

♥फुजुल बातों के बजाए अल्लाह के जिक्र की तरफ माइल रहना चाहिये क्योंकी बेहतरी इसी मे है, हजरत इमाम गजाली ने चार वजहों की बिना पर फुजुल बातों से बचने कि तालीम दी हैं,...

•1)-पहली बात उन्होंने ये ब्यान फरमाई है की फुजुल बात किरामन कातिबीन को लिखने पड़ती है, इसलिए इंसान को फरिश्तो से शर्म व हया करते हुए सोचना चाहिये की इन्हें फूजुल लिखने की तकलीफ न दें,..
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•2)-दुसरी वजह ये है की  ये बात अच्छी नही की बेकार और बेहुदा बातों से भरा हुआ आमालनामा  अपने रब के हुजुर पेश हो, इसलिए फुजुल बातों से दुर ही रहना अच्छा है,

•3)-तीसरी वजह ये है की बन्दे को क्यामत के रोज कहा जायेगा की अपना आमालनामा तमाम लोगो को खुद पढ़कर सुनाये, उस वक्त हश्र की खौफनाक सख्तियां उसके सामने होगी, इंसान प्यास की तकलीफ से मर रहा होगा, जिस्म पर कपड़ा नही होगा, भुख से कमर टुट रही होगी, जन्नत मे दाखिल होने से रोक दिया जायेगा, और हर किस्म की राहत उसपर बन्द कर दी गयी होगी, ऐसे हालत मे अपने ऐसे आमलनामे को पढ़ना जो फुजुल और बेहुदा गुफ्तगू से पुरा हो, किस कद्र तकलीफ दे चीज होगी, इसलिए चाहीये की जबान से सिवाए अच्छी बात के कुछ न निकाले,...

•4)-चौथी वजह ये है की बंदे को फुजुल और गैर जरुरी बातों पर मलामत की जायेगी और शर्म दिलाई जाएगी और बंदे के पास इसका कोई जवाब नही होगा, और अल्लाह तआला के सामने शर्म व नदामत की वजह से इंसान पानी पानी हो जायेगा