Saturday, April 15, 2017

औरत खुदा का दिया हुआ एक नायाब तोहफा है !!

📶औरत खुदा का दिया हुआ एक नायाब तोहफा है !!
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प्रेगनेन्ट औरत की 2 रकात नमाज आम औरत की 70 रकात नमाज से बढ़कर हे !!
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शौहर परेशान घर आए ओर बीवी उसे तसल्ली दे तो उसे जिहाद का सवाब मिलता है!।
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जो औरत अपने बच्चे के रोने की वजह से सो ना सकी उसे 70 गुलाम आजाद करने का सवाब मिलता हे !।
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शौहर और बीवी एक दूसरे को मोहब्बत की नजर से देखेँ तो अल्लाह उन्हे मोहब्बत की नजर से देखता है।।
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जो औरत अपने शौहर को अल्लाह के रास्ते मेँ भेजे वो जन्नत मेँ अपने शौहर से 500 साल पहले जाएगी ।।
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जो औरत आटा गुंदते वक़्त बिस्मिल्लाह पढ़े तो उसके रिज्क मेँ बरकत डाल दी जाती हे !!
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जो औरत गैर मर्द को देखती है  अल्लाह उसपर लानत भेजता हे !!
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जब औरत अपने शौहर के बिना कहे उनके पेर दबाती हे तो उसे 70 तोला सोना सदका करने का सवाब मिलता हे !!
☝जो पाक दामन औरत नमाज रोजे की पाबंदी करे और जो शौहर की खिदमत करे उसके लिए जन्नत के 8 दरवाजे खोल दिए जाते है।
☝औरत के एक बच्चे के पैदा करने पर  75 साल की नमाज का सवाब और हर एक दर्द पर 1 हज का सवाब हे ।
☝बारीक लिबास पहनने वाली और गैर मर्द से मिलने वाली औरत कभी जन्नत मेँ दाखिल नहीँ होगी ।
👉 👉जल्दी करो 
(1) मेहमान को खाना खिलाने में
(2) मैय्यत को दफनाने मे
(3) बालिग लड़कियो का निकाह कराने म
(4) कर्ज अदा करने में
(5) गुनाह से तौबा करने में !
"अस्ताग-फिरुल्लाहा रब्बी मिन-कुल्ली ज़न्बिउन वातुबू इलैही"
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आज आप यह मेसेज अगर किसी 1 को भी शेयर करदें तो आप सोच भी नही सकते कितने लोग "अल्लाह" से तौबा कर लेंगे इंशा अल्लाह
शेयर करना न भूलें.....

Monday, April 10, 2017

गुफ्तगू के उसुल व आदाब और अहकाम

गुफ्तगू के उसुल व आदाब और अहकाम


फुजुल_बात_चीत_की_मुमानियत

♥फुजुल बातों के बजाए अल्लाह के जिक्र की तरफ माइल रहना चाहिये क्योंकी बेहतरी इसी मे है, हजरत इमाम गजाली ने चार वजहों की बिना पर फुजुल बातों से बचने कि तालीम दी हैं,...

•1)-पहली बात उन्होंने ये ब्यान फरमाई है की फुजुल बात किरामन कातिबीन को लिखने पड़ती है, इसलिए इंसान को फरिश्तो से शर्म व हया करते हुए सोचना चाहिये की इन्हें फूजुल लिखने की तकलीफ न दें,..
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•2)-दुसरी वजह ये है की  ये बात अच्छी नही की बेकार और बेहुदा बातों से भरा हुआ आमालनामा  अपने रब के हुजुर पेश हो, इसलिए फुजुल बातों से दुर ही रहना अच्छा है,

•3)-तीसरी वजह ये है की बन्दे को क्यामत के रोज कहा जायेगा की अपना आमालनामा तमाम लोगो को खुद पढ़कर सुनाये, उस वक्त हश्र की खौफनाक सख्तियां उसके सामने होगी, इंसान प्यास की तकलीफ से मर रहा होगा, जिस्म पर कपड़ा नही होगा, भुख से कमर टुट रही होगी, जन्नत मे दाखिल होने से रोक दिया जायेगा, और हर किस्म की राहत उसपर बन्द कर दी गयी होगी, ऐसे हालत मे अपने ऐसे आमलनामे को पढ़ना जो फुजुल और बेहुदा गुफ्तगू से पुरा हो, किस कद्र तकलीफ दे चीज होगी, इसलिए चाहीये की जबान से सिवाए अच्छी बात के कुछ न निकाले,...

•4)-चौथी वजह ये है की बंदे को फुजुल और गैर जरुरी बातों पर मलामत की जायेगी और शर्म दिलाई जाएगी और बंदे के पास इसका कोई जवाब नही होगा, और अल्लाह तआला के सामने शर्म व नदामत की वजह से इंसान पानी पानी हो जायेगा

Friday, April 7, 2017

हज़रत मुहम्मद (स.अ.व.)

हिन्दू/मस्लिम सभी लौग इस पर गौर करें..

मैं बात कर रहा हूँ इस्लाम के आख़िरी नबी हज़रत मुहम्मद (स.अ.व.) की.

👍आप (स.अ.व.) ने औरतों के हक़ में उस वक़्त आवाज़ उठाई जिस दौर में बेटियों को जिंदा दफना दिया जाता था और विधवाओं को जीने तक का अधिकार न था.

👍हाँ ये वही मुहम्मद (स.अ.व.) हैं जिन्होंने एक गरीब नीग्रो बिलाल (र.अ.) को अपने गले से लगाया, अपने कंधों पर बैठाया, और इस्लाम का पहला आलिम मुक़र्रर किया.

👍वही मुहम्मद (स.अ.व.) जिन्होंने कहा की मज़दूर का मेहनताना उसका पसीना सूखने से पहले अदा करो, मज़दूर पर उसकी ताक़त से ज़्यादा बोझ न डालो, यहाँ तक की काम में मज़दूर का हाथ बटाओ.

👍वही मुहम्मद (स.अ.व.) जिन्होंने कहा की वो इंसान मुसलमान नहीं हो सकता जिसका पड़ोसी भूखा सोये, चाहे वो किसी भी मज़हब का हो.

👍वही मुहम्मद (स.अ.व.)
जिन्होंने कहा की अगर किसी ग़ैर मुस्लिम पर किसी ने ज़ुल्म किया तो अल्लाह की अदालत में वो खुद उस ग़ैर मुस्लिम की वक़ालत करेंगे.

👍वही मुहम्मद (स.अ.व.) जिन्होंने अपने ऊपर कूड़ा फेंकने वाली बुज़ुर्ग औरत का जवाब हमेशा मुस्कुरा कर दिया और उसके बीमार हो जाने पर ख़ुद खैरियत पूछने जाते हैं.

👍हाँ वही मुहम्मद (स.अ.व.) जिन्होंने कहा की दूसरे मज़हब का मज़ाक न बनाओ.

👍वही मुहम्मद (स.अ.व.)
जिन्होंने जंग के भी आदाब
तय किये की सिर्फ अपने बचाव में ही हथियार उठाओ.
बच्चे, बूढों और औरतों पर हमला न करो बल्कि पहले
उन्हें किसी महफूज़ जगह पहुँचा दो.  यहाँ तक की पेड़ पौधों को भी नुकसान ना पहुचाने की हिदायत दी.

उसी अज़ीमुश्शान शख्सिअत के बारे में लिखते लिखते कलम थक जायगी मगर उसकी शान कभी कम न होगी.  उन पर हमारी जान कुर्बान.

सभी धर्म के भाइयों को बताना चाहुंगा कि अगर कोई इन्सान गलती करता हे तो वो इन्सान बुरा होता है उसका धर्म/मज़हब नही.

21 वीं सदी मे बहुत ऐसे लोग हैं जो दुनिया मे इतना मग्न हो गये है कि जिनको खुद इस्लाम की नोलैज नही हे तो बो बच्चो को क्या इस्लाम के बारे मै बताऐंगे.

याद रखो... इस्लाम 100% पाक ओर साफ मज़हब हे.  किसी के कहने सुनने पर इसे बुरा ना कहो और अब भी अगर आपके दिमाग मे इस्लाम को लेकर कोई गलतफैमी है तो आप खुद मुहम्मद (स.अ.व.) की जीवनी (लाइफ हिस्ट्री)
पड़कर देखें... आपको जर्रा (पौइंट) बराबर भी गलती नजर नही आयेगी..!!!
अगर कोई मुस्लिम गलती/बत्तमीजी करता दिखे तो आप उससे सिर्फ इतना बौलना की क्या नबी मुहम्मद (स.अ.व.) ने आपको यही सिखाया है? तुमको नबी का ज़रा भी डर नहीं.?

सच्चा मुसलमान होगा तो शर्म से पानी पानी होकर तौबा कर लेगा..!!!!

प्लीज आपसे रिक्वेस्ट है कि इस मेसेज को फौरबर्ड कर इस्लाम के लिये जो लोगो के दिल-औ-दिमाग मे नाइत्तिफाख़ी/बुराई हे उसे दूर करने मे हमारी मदद करें...

अगर आप ईमान वाले हैं तो प्लीज दोस्तों शेयर ज़रूर करें ताकि हर मुस्लिम हर गैर मुस्लिम के पास ये सन्देश पहुंचे -

फ़िरकों में बांटने की राजनीति

वाह रे नासमझ मुसलमान! क्या ईमान पाया है, चन्द ज़ाहिल आलिमों के चक्कर में अल्लाह का कलाम (क़ुरान ए पाक) को जाने  अनजाने में मानने से इन्कार करना शुरू कर दिए...।

जी हाँ, जहाँ तक दुनिया जानती है कुछ जाहील आलिम बड़े शान से उस हदीस के मफ़हूम जिससे रिवायत है "मुसलमानों के 73 फ़िरके होंगे" को फेमस कर अपने फ़िरके की दुकान चमका रहे हैं...।

लेकिन क्या ऊनोने कभी क़ुरान की दलील इन आयतों पर दी है?

"सब मिल कर अल्लाह की रस्सी को मज़बूती से थाम लो और फिर्क़ों में मत बटो...।"
(सुर: आले इमरान-103)

"तुम उन लोगो की तरह न हो जाना जो फिरकों में बंट गए और खुली-खुली वाज़ेह हिदायात पाने के बाद इख़्तेलाफ़ में पड़ गए, इन्ही लोगों के लिए बड़ा अज़ाब है...।"
(सुर:आले इमरान -105)

"जिन लोगों ने अपने दीन को टुकड़े टुकड़े कर लिया और गिरोह-गिरोह बन गए, आपका (यानि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का) इनसे कोई ताल्लुक नहीं, इनका मामला अल्लाह के हवाले है, वही इन्हें बताएगा की इन्होंने क्या कुछ किया है...।"
(सुर: अनआम-159)

"फिर इन्होंने खुद ही अपने दीन के टुकड़े-टुकड़े कर लिए, हर गिरोह जो कुछ इसके पास है इसी में मगन है...।"
(सुर: मोमिनून -53)

""तुम्हारे दरमियान जिस मामले में भी इख़्तेलाफ़ हो उसका फैसला करना अल्लाह का काम है..."
(सुर: शूरा -10)

"और जब कोई एहतराम के साथ तुम्हें सलाम करे तो उसे बेहतर तरीके के साथ जवाब दो या कम अज़ कम उसी तरह (जितना उसने तुम्हें सलाम किया) अल्लाह हर चीज़ का हिसाब लेने वाला है...।
(सुर: निसा -86)

"अल्लाह ने पहले भी तुम्हारा नाम मुस्लिम रखा था और इस (क़ुरआन) में भी (तुम्हारा यही नाम है) ताकि रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) तुम पर गवाह हों...।"
(सुर: हज -78)

"बेशक सारे मुसलमान भाई भाई हैं, अपने भाइयों में सुलह व मिलाप करा दिया करो और अल्लाह से डरते रहो ताकि तुम पर रहम किया जाये...।"
(सुर: हुजरात -10)

और जिस हदीस के मफ़हूम को इतनी मेहनत से नफ़रत फ़ैलाने में इस्तमाल करते हैं क्या कभी उस मफ़हूम को पूरा पढ़ के सुनाया इन ढोंगी मौलवीयों ने?

जो पुरी तरह है "मेरी उम्मत के 73 फ़िरके होंगे, पर तुम उन फ़िरकों में मत बंट जाना" और सिर्फ़ पहली लाईन को पकड़ के फ़िरकों में बांटने की ठेकेदारी कर रहे चन्द उलेमाओं ने यह भी नहीं बताया की क़ुरान की एक भी बात को न मानना कुफ्र है...।

तो ज़रा सोचिये और बताईये फ़िरकों के नाम पर लड़ने वाले लोग ऊपर दी गई आयतों को कितना मानते हैं ????

मैं इतना बड़ा आलिम तो नहीं हूँ लेकिन अल्हमदुलिल्लाह मैं क़ुरान की इन आयतों के हवाले से कहता हूँ मैं मुसलमान हूँ और मेरा कोई फ़िरका नहीं है...।

अब आप सोंचे आपको फ़िरकों में बंट के क़ुरान की नाफ़रमानी करनी है या उन कठमुल्लों का #बायकाट करना है जो फ़िरकों में बांटने की राजनीति करते हैं...।

Saturday, March 18, 2017

मुसलमान बदलाव लाए

मुसलमान बदलाव लाएं:-

मुसलमानों को अब कुछ बदलाव करना ही पड़ेंगे, सामूहिक:-

1. मस्जिदों को सभी के लिए आम करदे, जो बंदा आना चाहे आये, जिसे दुआ मांगना हो ख़ुदा से मांगे। सभी धर्म के लोगों के आने का इंतज़ाम हो। उन्हें जो सवाल पूछना हो इस्लाम या ख़ुदा या रसूल के बारे में उनके जवाब भी कोई समझदार इंसान दे।

2. मस्जिदों को बस नमाज़ पढ़ने की ही जगह न बनाये। वहाँ ग़रीबो के खाने का इंतज़ाम हो, डिप्रेशन में उलझे लोगो की कॉउन्सेल्लिंग हो, उनके पारिवारिक मसलो को सुलझाने का इंतेज़ाम हो, मदद मांगने वालो की मदद की जाने का इंतेज़ाम हो। जब दरगाहों पर लंगर चल सकता हैं तो मस्जिदों में क्यों नहीं, और दान करने में मुस्लिमो का कहा कोई मुकाबला है, हम आगे आएंगे तो सब बदलेगा।

3.मस्जिदों में अगर कोई दूसरे मज़हब के भाई बहन आये तो उनके स्वागत या इस्तक़बाल का इंतज़ाम हो।उन्हें बिना खाना खिलाये हरगिज़ न भेजें।

4.मस्जिदों में एक शानदार लाइब्रेरी हो। जहाँ पर इस्लाम की हर किताब के साथ-साथ दूसरे मज़हब की किताबें भी पढ़ने को उपलब्ध हो। ई-लाइब्रेरी भी ज़रूर हो। बहुत होगये मार्बल, झूमर, ऐ.सी. और कालिंदो पर खर्च अब उसे बंद करके कुछ सही जगह पैसा लगाये।

5.समाज या कौम के पढ़े लिखे लोगो का इस्तेमाल करे। डॉक्टरों से फ्री इलाज़ के लिए कहे मस्ज़िद में ही कही कोई जगह देकर, वकील, काउंसलर, टीचर आदि को भी मस्जिद में अपना वक्त देने को बोले और यह सुविधा हर धर्म वाले के लिए बिलकुल मुफ्त हो।इसके लिए लगभग सभी लोग तैयार होजाएंगे, जब दुनिया के सबसे बड़े और सबसे व्यस्त सर्जन डॉ मुहम्मद सुलेमान भी मुफ्त कंसल्टेशन के लिए तैयार रहते हैं, तो आम डॉ या काउंसलर क्यों नही होंगे? ज़रूरत है बस उन्हें मैनेज करने की।

6.इमाम की तनख्वा ज्यादा रखे ताकि टैलेंटेड लोग आये और समाज को दिशा दें।

7.मदरसों से छोटे छोटे कोर्स भी शुरू करें कुछ कॉररेस्पोंडेंसे से भी हो। किसी अन्य धर्म का व्यक्ति भी आकर कुछ पढ़ना चाहे तो उसका भी इंतेज़ाम हो।

8.ट्रस्ट के शानदार हॉस्पिटल और स्कूल खोले जहाँ सभी को ईमानदारी और बेहतरीन किस्म का इलाज़ और पढ़ने का मौका मिले, बहुत रियायती दर पर। यह भी हर मज़हब वालो के लिये हो, बिलकुल बराबर।

इनमे से एक भी सुझाव नया नहीं है, सभी काम 1400 साल पहले मदीना में होते थे...हमने उनको छोड़ा और हम बर्बादी की तरफ बढ़ते चले गए... और जा रहे हैं।रुके, सोचे और फैसला ले।

گروپ میں موجود تمام معزز قارئین کرام علماء کرام آپ سب کی اس ☝پوسٹ اور پیغام کے بارے میں کیا  رائے ہے  اور  ہاں میں ہے  تو  کون کتنا اس تحریک کو کتنا اہمیت دے رہا ہے  یا دیگا؟ ؟؟؟؟؟؟

(

سائل مسئول سب کے لئے یکساں )

كنتم خير امه اخرجت للناس تامرون بالمعروف وتنهون عن المنكر


Monday, March 13, 2017

अब फ़क़त शोर मचाने से नहीं कुछ होगा



अब फ़क़त शोर मचाने से नहीं कुछ होगा।।
सिर्फ होठों को हिलाने से नहीं कुछ होगा।।

ज़िन्दगी के लिए बेमौत ही मरते क्यों हो।।
अहले इमां हो तो शैतान से डरते क्यों हो।।

सारे ग़म सारे गिले शिकवे भुला के उठो।
दुश्मनी जो भी है आपस में भुला के उठो।।

अब अगर एक न हो पाए तो मिट जाओगे।।
ख़ुश्क पत्त्तों की तरह तुम भी बिखर जाओगे।।

खुद को पहचानो की तुम लोग वफ़ा वाले हो।।
मुस्तफ़ा वाले हो मोमिन हो खुदा वाले हो।।

कुफ्र दम तोड़ दे टूटी हुई शमशीर के साथ।।
तुम निकल आओ अगर नारे तकबीर के साथ।।

अपने इस्लाम की तारीख उलट कर देखो ।
अपना गुज़रा हुआ हर दौर पलट कर देखो।।

तुम पहाड़ों का जिगर चाक किया करते थे।।
तुम तो दरयाओं का रूख मोड़ दिया करते थे।।

तुमने खैबर को उखाड़ा था तुम्हे याद नहीं।।
तुमने बातिल को पिछाड़ा था तुम्हे याद नहीं।।।

फिरते रहते थे शबो रोज़ बियाबानो में।।
ज़िन्दगी काट दिया करते थे मैदानों में..

रह के महलों में हर आयते हक़ भूल गए।।
ऐशो इशरत में पयंबर का सबक़ भूल गए।।

ठन्डे कमरे हंसी महलों से निकल कर आओ।।
फिर से तपते हु सहराओं में चल कर आओ।।

लेके इस्लाम के लश्कर की हर एक खुबी उठो।।
अपने सीने में लिए जज़्बाए ज़ुमी उठो।।

राहे हक़ में बढ़ो सामान सफ़र का बांधो।।
ताज़ ठोकर पे रखो सर पे अमामा बांधो।।

तुम जो चाहो तो जमाने को हिला सकते हो।।।
फ़तह की एक नयी तारीख बना सकते हो।।।

खुद को पहचानों तो सब अब भी संवर सकता है।।
दुश्मने दीं का शीराज़ा बिखर सकता है।।

हक़ परस्तों के फ़साने में कहीं मात नहीं।
तुमसे टकराए "मुनव्वर" इनकी ये औक़ात नहीं।।

#मुन्नवर_राणा सहाब की यह ग़ज़ल ने सच का मानो आईना दिखा दिया

वर्तमान हालात पर मुसलमानों को गौर करना ही होगा, साथ ही अपने और अल्लाह के दर्मियान रिश्ते को मजबूत करना होगा✍🏻

Saturday, March 11, 2017

इल्जाम लगाना छोड़ दो

*झूठी गवाही से बचो*
*इल्जाम लगाना छोड़ दो*
_____________________________________
*झूठी गवाही देना और किसी पर इल्ज़ाम लगाना बहुत ही बुरा काम है,*

*सरकारे मदीना* صلی اللہ علیہ وسلم
के इर्शादात पढीये, और अपनी आख़िरत की फ़िक्र करते हुये इस कबीरा गुनाह से खुद बचें और दूसरों को बचायें,

*झूठे गवाह के क़दम हटने भीन पायेंगे कि अल्लाह तआला उसके लिये जहन्नम वाजिब कर देगा*
📕इब्ने माजा, हदीस नं, 2373

*जिस ने किसी मुसलमान को ज़लील करने की ग़र्ज़ से उस पर इल्ज़ाम लगाया तो अल्लाह तआला जहन्नम के पुल पर उसे रोक लेगा, यहां तक कि अपने कहने के मुताबिक़ वो अज़ाब पा ले*
📕अबू दाऊद, हदीस नं 4883

*जो किसी मुसलमान पर ऐसी चीज़ का इल्ज़ाम लगाये जिस के बारे में वो ख़ुद भी नहीं जानता हो, तो अल्लाह तआला उसे* (जहन्नमियों के ख़ून व पीप जमा होने की जगह)
*"रदग़तुल ख़बाल"* *में उस वक़्त तक रखेगा जब तक कि अपने इल्ज़ाम के मुताबिक़ अज़ाब पा न ले*
📕मुसन्निफ अब्दुर्रज़्ज़ाक़, हदीस नं 20905

Wednesday, March 8, 2017

मौत के आगोश में जब थक के सो जाती है माँ

मौत के आगोश में जब थक के सो जाती है माँ
तब कहीं जाकर थोड़ा सुकूं पाती है माँ।


फिक्र में बच्चों की कुछ इस तरह घुल जाती है माँ
नौ जवाँ होते हुए बूढ़ी नजर आती है माँ।।


रूह के रिश्तों की ये गहराईयां तो देखिए
चोट लगती है हमारे अोर चिल्लाती है माँ।


जानें कितनी बरस सी रातों में ऐसा भी हुआ
बच्चा तो छाती पे है गीले में सो जाती है माँ।।


जब खिलौनों को मचलता हैं कोई गुरबत का फूल
आसूंओ के साज पर बच्चों को बहलाती है माँ।


फिक्र के श्मशान में आखिर चिंताओं की तरह
जैसे सूखी लकड़ियां इस तरह जल जाती है माँ।।


अपने आँचल से गुलाबी आसूंओ को पोंछकर
देर तक गुरबत पर अपनी अश्क बरसाती है माँ।


सामने बच्चों के खुश रहती है हर एक हाल में
रात को छिप-छिपकर लेकिन अश्क बरसाती है माँ।।


कब जरूरत हो मेरे बच्चों को,इतना सोचकर
जागती रहती है आखें अोर सो जाती है माँ।


माँगती ही कुछ नहीं अपने लिए अल्लाह से
अपने बच्चों के लिए दामन को फैलाती है माँ।


अगर जवाँ बेटी हो घर में अोर कोई रिश्ता ना हो
एक नए अहसास की सूली पें चढ़ जाती है माँ।


हर इबादत हर मोहब्बत में बसी है एक गरज
बे गरज बे लोस हर खिदमत कर जाती है माँ।।


जिन्दगी के इस सफर में गरदिशो की धूप में
जब कोई साया नहीं मिलता तो याद आती है माँ।


प्यार कहते हैं किसे ओर ममता क्या चीज है
कोई उन बच्चों से पूछो जिनकी मर जाती है माँ।।


देर हो जाती है अक्सर घर आने में जब हमें
रेत पर मछली हो जैसे एेसे घबराती है माँ।


मरते दम बच्चा ना आ पाए अगर प्रदेश से
अपनी दोनों पुतलियाँ चोखट पे रख जाती है माँ।।


बाद मर जाने के फिर बेटे की सेवा के लिए
भेस बेटी का बदल कर घर में आ जाती है माँ।


चाहे हम खुशियों में माँ को भूल जाएं दोस्तों
जब मुसीबत सर पे आती है तो याद आती है माँ।।


दूर हो जाती है सारी उम्र की उस दम थकान
ब्याह कर बेटे को जब घर में बहु लाती है माँ।


छीन लेती है वही अक्सर सुकूने जिन्दगी
प्यार से दुल्हन 👰 बनाकर जिसको घर लाती है माँ।।


फेर लेते हैं नजर जिस वक्त बेटे अोर बहु
अजनबी अपने ही घर में बन जाती है माँ।


जब्त तो देखो कि इतनी बेरूखी के बावजूद न
बद्दुआ देती है हरगिज अोर न पछताती है माँ।।


बेटा कितना ही बुरा हो पर पडोसन के सामने
रोककर जज्बात को बेटे के गुण गाती हैं माँ।


शादियां करके बच्चे 🚸 जा बसे प्रदेश में
दिल खतों अोर तस्वीरें से बहलाती है माँ।।


अपने सीने पर रखे हैं काएनाते जिन्दगी
ये जमी इस वास्ते ऐ दोस्त कहलाती है माँ।


शुक्रिया हो ही नहीं सकता कभी इसका अदा
मरते-मरते भी दुआ जीने की दे जाती है माँ।।




Tuesday, March 7, 2017

तीन घरों में अल्लाह का कहर कभी भी नाज़िल हो सकता है!


तीन घरों में अल्लाह का कहर कभी भी नाज़िल हो सकता है!!!!!!

एक खुतबे में *हज़रत अली ؓ  फरमाते हैं ……..

तीन घरों में अल्लाह का कहर कभी भी नाज़िल हो सकता है, अल्लाह को सख्त नफरत है इन तीन घरों से

1- जिस घर में औरत की आवाज मर्द की आवाज से उपर (तेज) हो जाए, उस घर को 70,000 फरिश्ते सारा दिन कोसते रहते हैं

2- जिस घर में किसी के हक का मारा हुआ पैसा जमां हुआ हो और उसी मारे हुए हक के पैसों से उस घर की रोशनी ओ तकब्बुर हो

3- जिस घर के लोगों को मेहमानों का आना पसंद नहीं, हज़रत जिबरील ؑ   फरमाते है उस घर की नमाज़ों का सवाब फरिश्ते लिखा नहीं करते

अल्लाह तआला पढ़ने से ज्यादा अमल करने की तौफीक अता फरमाएं …
(आमिन )

Sunday, March 5, 2017

बाप की अज़मत باپ کی عظمت


एक शख़्स नबी करीम(स.अ) की ख़िदमत मे हाज़िर हुआ और उसने अपने बाप की शिकायत की के या रसूलल्लाह(स.अ) मेरा बाप मुझ से पूछता नहीं और मेरा सारा माल ख़्रच करदेता है.....!



आप(स.अ) ने उनके वालिदे मौहतरम को बुलवाया,



जब उनके वालिद को पता चला के मेरे बेटे ने रसूलुल्लाह(स.अ) से मेरी शिकायत की है तो दिल मे बोहौत रंजीदा हुऐ और रसूलुल्लाह(स.अ) की ख़िदमत मे हाज़री के लिये चलदिये.......!


चूंकि अरब की घुट्टी मे शायेरी थी तो रासते मे कुछ अशआर कहते हुऐ पहुंचे ..........!

इधर बारगाहे रिसालत मे पहुँचने  से पहले "हज़रत जिबराईल(अ.स) आप(स.अ) की ख़िदमत मे हाज़िर हुऐ और फरमाया के अल्लाह सुबहानहु तआला ने फरमाया है के इंका मामला बाद मे सुनियेगा पहले वोह अशआर सुनैं जो वोह सोचते हुऐ आरहे हैं


.........जब वोह हाज़िर हुऐ तो आप(स.अ) ने फरमाया के आपका मामला बाद मे सुना जायेगा पहले वोह अशआर सुनाईये जो आप सोचते हुऐ आये हैं..........!!!



वोह मुख़लिस सहाबी थे यह सुनकर रौने लगे के जो अशआर अभी मेरी ज़बान से अदा भी नहीं हुऐ मेरे कानौं ने भी नहीं सुने आप के रब ने सुन भी लिये और आपको बता भी दिया..........!!!



सहाबी ने अशआर पढने शुरू किये



ऐ मेरे बेटे जिस दिन तू पैदा हुआ

हमारी मेहनत के दिन भी शुरू होगये

तू रोता था हम सो नहीं सकते थे

तू नहीं खाता था हम खा नहीं सकते  थे

तू बीमार होजाता तो तुझे लिये तबीब के पास इलाजो मुआलजे के लिये मारे मारे फिरते थे

के कहीं कुछ हो न जाये

कहीं मर न जाये

हालांके मौत अलग चीज़ है और बीमारी अलग चीज़

फिर तुझे गरमी से बचाने के लिये

 मैं दिन रात काम करता के मेरे बेटे को ठंडी छांव मिलजाये

तुझे ठंड से बचाने के लिये मैने पत्थर तोडे तग़ारियां उठाईं के मेरे बच्चे को गरमी मिलजाये

जो कमाया तेरे लिये

जो बचाया तेरे लिये

तेरी जवानी के ख़्वाब देखने के लिये मैंने दिन रात महनत की, 


अब मेरी हड्डियां कमज़ोर होगईं हैं 

लेकिन तू कडियल जवान होगया

फिर मुझ पर ख़िज़ां ने डेरे डाल लिये और 

तुझ पर बहार आ गई

मैं झुक गया

तू सीधा होगया

अब मेरी ख्वाहिश और मेरी उम्मीद पूरी हुई के 

अब तू हरा भरा होगया है


चल अब ज़िंदगी की आख़री सांसैं तेरी छांव मे बैठ कर गुज़ारूंगा

मगर यह किया जवानी आते ही तेरे तैवर बदल गऐ

तेरी आंखैं माथे पर चढ गईं

तू ऐसे बात करता है 

जैसे मेरा सीना फाड कर रख देता है

तू  ऐसे बात करता है 

के कोई ग़ुलाम से भी बात नहीं करता

फिर मैने अपनी सारी ज़िंदगी की महनत को भुला दिया के 

मैं तेरा बाप नहीं नौकर हूं

नौकर को भी कोई ऐक वक़्त की रोटी दे ही देता है

तू नौकर समझ कर ही मुझे रोटी दे दिया कर



.............................................आप(स.अ) यह अशआर सुनकर इतना रोये के आप(स.अ) की डाढी मुबारक तर होगई, आप(स.अ) अपनी जगह से उठे और उस बेटे का ग्रहबान पकड कर फरमाया

तू और तेरा सब कुछ तेरे बाप का है

तू और तेरा सब कुछ तेरे बाप का है

तू और तेरा सब कुछ तेरे बाप का है

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अल्लाह रब्बे करीम से दुआ है

رب ارحمهماكما رب ياني صغيراا

ایک شخص نبی کریم (س) کی خدمت میں حاضر ہوا اور اس نے اپنے باپ کی شکایت کی کے یا رسول اللہ (س) میرا باپ مجھ سے پوچھتا نہیں اور میرا سارا مال خرچ کردیتا ہے .....!



آپ (س) نے ان والدے موهترم کو بلوایا،



جب ان کے والد کو پتہ چلا کے میرے بیٹے نے رسول (س) سے میری شکایت کی ہے تو دل میں بوهوت رنجیدہ ہوئے اور رسول اللہ (س) کی خدمت میں حاضری کے لیے چلديے .......!


چونکہ عرب کی گھٹی میں شايےري تھی تو راستے میں کچھ اشعار کہتے هے پہنچے ..........!

ادھر بارگاہ رسالت میں پہنچنے سے پہلے "حضرت جبرايل (اس) آپ (س) کی خدمت میں حاضر ہوئے اور فرمایا اللہ سبهانه تعالی نے فرمایا ہے کے انکا معاملہ بعد میں سنيےگا پہلے ووه اشعار سنے جو ووه سوچتے هے آرہے ہیں


......... جب ووه حاضر هے تو آپ (س) نے فرمایا کے خوش معاملہ بعد میں سنا جائے گا پہلے ووه اشعار سناييے جو آپ سوچتے هے آئے ہیں ..........! !!



ووه مخلص صحابی تھے یہ سن کر رونے لگے جو اشعار ابھی میری زبان سے ادا نہیں هے میرے كانو نے بھی نہیں سنے آپ کے رب نے سن بھی لئے اور آپ کو بتا بھی دیا .......... !!!



صحابی نے اشعار پڑھنے شروع کیے



اے میرے بیٹے جس دن تو پیدا ہوا

ہماری محنت کے دن بھی شروع هوگيے

تو روتا تھا ہم سو نہیں سكتے تھے

تو نہیں کھاتا تھا ہم کھا نہیں سكتے تھے

تو بیمار ہوجاتا تو تجھے کیلئے طبیب کے پاس الاجو مالجے کیلئے مارے مارے پھرتے تھے

کہیں کچھ ہو نہ جائے

کہیں مر نہ جائے

هالاكے موت مختلف چیز ہے اور بیماری مختلف چیز

پھر تجھے گرمی سے بچانے کے لئے میں دن رات کام کرتا کے میرے بیٹے کو ٹھنڈی چھاؤں ملجايے

تجھے سردی سے بچانے کیلئے میں نے پتھر توڈے تغاريا اٹھائیں میرے بچے کو گرمی ملجايے

جو کمایا تیرے لئے

جو بچایا تیرے لئے

تیری جوانی کے خواب دیکھنے کے لیے میں نے دن رات محنت کی، اب میری ہڈیاں کمزور ہوگئیں ہیں لیکن تو كڈيل جوان ہوگیا

پھر مجھ پر خزاں نے ڈیرے ڈال لیے اور تجھ پر بہار آ گئی

میں جھک گیا

تو براہ راست ہوگیا

اب میری خواہش اور میری امید پوری ہوئی اب تو ہرا بھرا ہوگیا ہے

چل اب زندگی کی آخری ساسے تیری چھاؤں میں بیٹھ کر گذاروگا

مگر یہ کیا جوانی آتے ہی تیرے تےور بدل گے

تیری اكھے پیشانی پر چڑھ گئیں

تو ایسے بات کرتا ہے جیسے میرا سینہ پھاڑ کر رکھ دیتا ہے

تو ایسے بات کرتا ہے کے کوئی غلام سے بھی بات نہیں کرتا

پھر میں نے اپنی ساری زندگی کی محنت کو بھلا دیا کے میں تیرا باپ نہیں نوکر ہوں

نوکر کو بھی کوئی ےك وقت کی روٹی دے ہی دیتا ہے

تو نوکر سمجھ کر ہی مجھے روٹی دیدیا کر



............................................. آپ (س ) یہ اشعار سن کر اتنا روئے کے آپ (س) کی ڈاڈھی مبارک تر ہوگئی، آپ (س) اپنی جگہ سے اٹھے اور اس بیٹے کا گرهبان پکڑ کر فرمایا

تو اور تیرا سب کچھ تیرے باپ کا ہے

تو اور تیرا سب کچھ تیرے باپ کا ہے

تو اور تیرا سب کچھ تیرے باپ کا ہے

.................................................. ...

اللہ رب کریم سے دعا ہے

رب ارحمهماكما رب ياني صغيرا

Saturday, February 18, 2017

मेरे सवाल और क़ुरान के जवाब

बहुत प्यारा मैसेज है अपने दोस्तों को ज़रूर भेजें।

🔵मेरे सवाल और
🔴क़ुरान के जवाब

🔵मैंने कहा: तेरी मदद कैसे मिलेगी या रब?
जवाब मिला:
🔴सब्र और नमाज़ से मदद लिया करो।

🔵मैंने कहा: मैं बहुत गुनाहगार हूँ।
जवाब मिला:
🔴अल्लाह की रहमत से मायूस न हो अल्लाह सब गुनाह बख़्श देगा।

🔵मैंने कहा: मेरे दिल को सुकून नहीं है।
जवाब मिला:
🔴बेशक़ अल्लाह की याद से ही दिल को इतमिनान है।

🔵मैंने कहा: मैं बहुत अकेला हूँ।
जवाब मिला:
🔴बेशक़ हम राग़-ए-जान से भी ज़्यादा क़रीब हैं।

🔵मैंने कहा: मुझे कोई याद नहीं करता।
जवाब मिला:
🔴तुम मुझे याद करो मैं तुम्हें याद करूँगा।

🔵मैंने कहा:
मेरी राहों मे बहुत परेशानियाँ हैं।
जवाब मिला:
🔴जो अल्लाह से डरता है, अल्लाह उसकी निजात की सूरत निकाल देता है।

🔵मैंने कहा: मेरे बहुत से अधूरे ख्वाब हैं।
जवाब मिला:
🔴मुझसे दुआ करो मैं कुबूल करूँगा।

ख़ुशनसीब हूँ मैं, क्योंकि मुसलमान हूँ।

🔷किसी को सलाम करूँ तो नेक़ी,
🔷किसी को मुस्कुराकर देखूँ तो नेक़ी,
🔷कोई काम से पहले बिसमिल्लाह पढ़ूँ तो नेक़ी,
🔷गुस्सा पी जाऊँ तो नेक़ी,
🔷सीधे हाथ से पानी पीऊँ तो नेक़ी,
🔷किसी को सही पता बताऊँ तो नेक़ी,
🔷किसी का हक़ अदा करूँ तो नेक़ी,
🔷कुरान सुनूँ या सुनाऊँ तो नेक़ी,
🔷माँ बाप को के देखूँ तो हज का सवाब,
🔷ये सब बात किसी को बताऊँ तो नेक़ी,
🔷वो अमल करे तो भी नेक़ी।

अल्लाह तो लुटा रहा है बस, हम लेने वाले बन जाएँ।
आमीन!

जब हम क़ुरान पाक़ उठाते हैं तो शैतान के सर में दर्द होता है,
जब हम क़ुरान पाक़ खोलते हैं तो वो परेशान हो जाता है,
जब हम क़ुरान पाक़ को पढ़ते हैं तो वो कमज़ोर हो जाता है,
तो चलो, आओ क़ुरान पाक़ पढ़ें ताकि वो कमज़ोर हो जाए।
इतना कमज़ोर कि एक दिन ऐसा आए कि वो उठ भी न सके।
और क्या आप जानते हो?
कि आप इस मैसेज को फाॅरवर्ड करने का इरादा करोगे तो शैतान तुम्हारे इरादे को कमज़ोर करने की कोशिश ज़रूर करेगा।
मगर आप अपने इरादे को कमज़ोर न होने देना।

Allah hafiz & please send to all your friends...